Posts

Showing posts with the label gyan

Gita

कबीरसागर_का_सरलार्थPart_3 '‘व्रत करना गीता अनुसार कैसा है‘‘ प्रातः काल धर्म दास वक्त से उठा। पहले खाना बनाने लगा। उस दिन भक्ति की कोई क्रिया नहीं की। पहले दिन जंगल से कुछ लकडि़याँ तोड़कर रखी थी। उनको चूल्हे में जलाकर भोजन बनाने लगा। एक लकड़ी मोटी थी। वह बीचो-बीच थोथी थी। उसमें अनेकां चीटियाँ थीं। जब वह लकड़ी जलते-जलते छोटी रह गई तब उसका पिछला हिस्सा धर्मदास जी को दिखाई दिया तो देखा उस लकड़ी के अन्तिम भाग में कुछ तरल पानी-सा जल रहा है। चीटियाँ निकलने की कोशिश कर रही थी, वे उस तरल पदार्थ में गिरकर जलकर मर रही थी। कुछ अगले हिस्से में अग्नि से जलकर मर रही थी। धर्मदास जी ने विचार किया। यह लकड़ी बहुत जल चुकी है, इसमें अनेकों चीटियाँ जलकर भस्म हो गई है। उसी समय अग्नि बुझा दी। विचार करने लगा कि इस पापयुक्त भोजन को मैं नहीं खाऊँगा। किसी साधु सन्त को खिलाकर मैं उपवास रखूँगा। इससे मेरे पाप कम हो जाएंगे। यह विचार करके सर्व भोजन एक थाल में रखकर साधु की खोज में चल पड़ा। परमेश्वर कबीर जी ने अन्य वेशभूषा बनाई जो हिन्दू सन्त की होती है। एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्मदास जी ने साधु को देखा। उनके सामन...

god is one

Image
‘‘मानव जीवन की आम धारणा’’जब तक यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तो जन-साधारण की धारणाहोती है कि :-1ण् बड़ा होकर पढ़-लिखकर अपने निर्वाह की खोज करके विवाह कराकरपरिवार पोषण करेंगे। बच्चों को उच्च शिक्षा तक पढ़ाऐंगे। फिर उनको रोजगारमिल जाए। उनका विवाह करेंगे । परमात्मा संतान को संतान दे। फिर हमाराकर्तव्य पूरा हुआ। कई बार गाँव या गवांड ( पड़ौसी गाँव) के वृद्ध इकट्ठे होते तोआपस में कुशल-मंगल जानते तो एक ने कहा कि परमात्मा की कृपा से दो लड़केतथा दो लड़की हैं। कठिन परिश्रम करके पाला-पोसा तथा पढ़ाया, विवाह करदिया। सब के सब बेटा-बेटियों वाले हैं। मेरा कार्य पूर्ण हुआ। 75 वर्ष का हो गयाहूँ। अब बेशक मौत हो जाए, मेरा जीवन सफल हुआ। वंश बेल चल पड़ी, संसारमें नाम रहेगा।विवेचन :- उपरोक्त प्रसंग में जो भी प्राप्त हुआ, वह पूर्व निर्धारित संस्का