करोंत लेने से कोई लाभ नहीं होगा।‘‘काशी में करौंत की स्थापना की कथा’’शास्त्राविधि त्यागकर मनमाना आचरण करने यानि शास्त्रों में लिखी भक्ति विधिअनुसार साधना न करने से गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि उस साधक को नतो सुख की प्राप्ति होती है, न भक्ति की शक्ति (सिद्धि) प्राप्त होती है, न उसकी गति(मुक्ति) होती है अर्थात् व्यर्थ प्रयत्न है। हिन्दू धर्म के धर्मगुरू जो साधना साधक समाज कोबताते हैं, वह शास्त्रा प्रमाणित नहीं है। जिस कारण से साधकों को परमात्मा की ओर से कोईलाभ नहीं मिला जो भक्ति से अपेक्षित किया। फिर धर्मगुरूओं ने एक योजना बनाई ि ‘‘सुमिरन के अंग’’ का सरलार्थ ‘‘सुमिरन के अंग’’ का सरलार्थ ‘‘सुमिरन के अंग’’ का सरलार्थभगवान शिव का आदेश हुआ है कि जो काशी नगर में प्राण त्यागेगा, उसके लिए स्वर्ग काद्वार खुल जाएगा। वह बिना रोक-टोक के स्वर्ग चला जाएगा। जो मगहर नगर (गोरखपुरके पास उत्तरप्रदेश में) वर्तमान में जिला-संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) में है, उसमें मरेगा,वह नरक जाएगा या गधे का शरीर प्राप्त करेगा। गुरूजनों की प्रत्येक आज्ञा का पालनकरना अनुयाईयों का परम धर्म माना गया है। ...
Comments
Post a Comment